28/07/17

आज के इंसान की सच्चाई

Rajni Kapoor · मैं थक-हार कर काम से घर वापस जा रहा था। कार में शीशे बंद होते हुए भी..जाने कहाँ से ठंडी-ठंडी हवा अंदर आ रही थी…मैं उस सुराख को ढूंढने की कोशिश करने लगा..पर नाकामयाब रहा। कड़ाके की ठण्ड में आधे घंटे की ड्राइव के बाद मैं घर पहुंचा… रात के 12 बज चुके थे, मैं घर के बाहर कार से आवाज देने लगा….बहुत देर हॉर्न भी बजाया…शायद सब सो चुके थे… 10 मिनट बाद खुद ही उतर कर गेट खोला….सर्द रात के सन्नाटे में मेरे जूतों की आवाज़ साफ़ सुनी जा सकती थी… कार अन्दर कर जब दुबारा गेट बंद करने लगा तभी मैंने देखा एक 8-10 साल का बच्चा, अपने कुत्ते के साथ मेरे घर के सामने फुटपाथ पर सो रहा है… वह एक अधफटी चादर ओढ़े हुए था … उसको देख कर मैंने उसकी ठण्ड महसूस करने की कोशिश की तो एकदम सकपका गया.. loading... मैंने Monte Carlo की महंगी जेकेट पहनी हुई थी फिर भी मैं ठण्ड को कोस रहा था…और बेचारा वो बच्चा…मैं उसके बारे में सोच ही रहा था कि इतने में वो कुत्ता बच्चे की चादर छोड़ मेरी कार के नीचे आ कर सो गया। मेरी कार का इंजन गरम था…शयद उसकी गरमाहट कुत्ते को सुकून दे रही थी… फिर मैंने कुत्ते की भागने की बजाय उसे वहीं सोने दिया…और बिना अधिक आहट किये पीछे का ताला खोल घर में घुस गया… सब के सब सो रहे थे….मैं चुप-चाप अपने कमरे में चला गया। जैसे ही मैंने सोने के लिए रजाई उठाई…उस लड़के का ख्याल मन आया…सोचा मैं कितना स्वार्थी हूँ….मेरे पास विकल्प के तौर पर कम्बल ,चादर ,रजाई सब थे… पर उस बच्चे के पास एक अधफटी चादर भर थी… फिर भी वो बच्चा उस अधफटी चादर को भी कुत्ते के साथ बाँट कर सो रहा था और मुझे घर में फ़ालतू पड़े कम्बल और चादर भी किसी को देना गवारा नहीं था… यही सोचते-सोचते ना जाने कब मेरी आँख लग गयी ….अगले दिन सुबह उठा तो देखा घर के बहार भीड़ लगी हुई थी.. बाहर निकला तो किसी को बोलते सुना- अरे वो चाय बेचने वाला सोनू कल रात ठण्ड से मर गया.. मेरी पलके कांपी और एक आंसू की बूंद मेरी आँख से छलक गयी..उस बच्चे की मौत से किसी को कोई फ़र्क़ नहीं पड़ा…बस वो कुत्ता अपने नन्हे दोस्त के बगल में गुमसुम बैठा था….मानो उसे उठाने की कोशिश कर रहा हो! ************ दोस्तों, ये कहानी सिर्फ एक कहानी नहीं ये आज के इंसान की सच्चाई है। मानव से अगर मानवता चली जाए तो वो मानव नहीं रहता दानव बन जाता है…और शायद हममें से ज्यादातर लोग दानव बन चुके हैं। हम अपने लिए पैदा होते हैं….अपने लिए जीते हैं और अपने लिए ही मर जाते हैं….ये भी कोई जीना हुआ! चलिए एक बार फिर से मानव बनने का प्रयास करते हैं…चलिए अपने घरों में बेकार पड़े कपड़े ज़रूरतमंदों के देते हैं…चलिए…कुछ गरीबों को खाना खिलाते हैं….चलिए….किसी गरीब बच्चे को पढ़ाने का संकल्प लेते हैं….चलिए एक बार फिर से मानव बनते हैं!

22/07/17

साध्यबेला.

साध्यबेला. . . सुबह से तीन बार पढ़ चुके ईमेल पर एक बार पुनः देवव्रत की निगाहें दौड़ने लगी थीं. लिखा था- “पापा, कल दीपक चाचा आए थे. उनसे पता चला, पिछले डेढ़ वर्ष से आपने अपने घर में एक पति-पत्नी को किराएदार के रूप में रखा हुआ है और वे दोनों आपका बहुत ख़्याल रखते हैं. आजकल समय बहुत ख़राब है पापा. ज़रा सोचिए, कोई बिना किसी स्वार्थ के एक पराए इंसान की देखभाल भला क्यों करेगा? कहीं आपने उनसे अपने पैसे या प्रॉपर्टी का ज़िक्र तो नहीं किया है? भारत में आए दिन ऐसी घटनाएं सुनने को मिलती हैं कि बुज़ुर्ग को मारकर लोग पैसा लूटकर चले गए. इसलिए ज़्यादा दिनों तक एक ही किराएदार को रखना ठीक नहीं है. लोग घर पर ही कब्ज़ा जमाकर बैठ जाते हैं. इसलिए अब दूसरा किराएदार ढूंढ़ लीजिए. मैं जल्द ही भारत आकर आपके सब प्रॉपर्टी के काम निपटाता हूं. बाकी फिर… आपका अंकित . बार-बार पढ़ने के बाद भी देवव्रत को पूरे मेल में उन संवेदनाओं का एहसास नहीं हुआ, जो एक बेटे के मन में उसके पिता के प्रति होती हैं. अंकित को इस बात का भय तो था कि कहीं किराएदार पापा के मकान पर कब्ज़ा न कर लें, पर इस बात की तसल्ली कतई नहीं थी कि कोई उसके पापा का ख़्याल रख रहा है. क्या वास्तव में दुनिया इतनी स्वार्थपूर्ण हो गई है कि लोग सोचना तक गवारा नहीं करते कि कोई निःस्वार्थ भाव से किसी पराए इंसान की देखभाल कर सकता है. जो फ़र्ज़ अंकित और उसकी पत्नी नेहा को पूरा करना चाहिए, वह फ़र्ज़ रजत और प्रिया पूरा कर रहे हैं. इस पर शर्मिंदा होने की जगह अंकित उनकी नीयत पर शक कर रहा है. क्या यही संस्कार दिए थे उन्होंने अपने पुत्र को? कहते हैं, समय की रेत पर हम जो पदचिह्न छोड़ जाते हैं, आनेवाली पीढ़ी उसी का अनुसरण कर आगे बढ़ती है. लेकिन शायद समय के साथ पुरानी मान्यताएं भी बेअसर हो चुकी हैं, वरना उन्होंने और उनकी पत्नी संध्या ने सदैव अपने माता-पिता की सेवा की थी. तीन भाइयों में वह बीच के थे. अपने दो बेटों से निराश होकर जब मां और पिताजी उनके पास रहने आए, तो उन्होंने कभी अपने पास से उन्हें जाने नहीं दिया. तन-मन से उनकी सेवा की. लेकिन कहीं कोई कमी तो अवश्य रह गई थी. कोई सूत्र हाथ से अवश्य ही छूटा था, वरना अंकित इतना भावनाशून्य कैसे बन गया? सबसे बड़ी बात, जो देवव्रत के हृदय को मथे डाल रही थी, वो यह कि कल संध्या की पुण्यतिथि थी, पर पत्र में इस बात का कहीं कोई ज़िक्र नहीं था. क्या वह अपनी मां को भी भूल गया है. पूरे चार वर्ष होने को आए, जब संध्या उन्हें छोड़कर इस दुनिया से चली गई थी. उसके रहते जीवन में कितना उल्लास था. कितनी जीवंतता थी. हरदम एक नई ऊर्जा से भरे रहते थे वह. पत्नी के साथ उम्र के अंतिम पड़ाव को ज़िंदादिली से गुज़ारने की ख़्वाहिश थी उनकी. किन्तु रिटायरमेंट के बाद तीन वर्ष साथ निभाकर संध्या एक रात सोई, तो सुबह उठी ही नहीं. नींद में ही हार्टफेल हो गया था उसका. देवव्रत की तो दुनिया ही उजड़ गई थी. संध्या के बिना जीवन की कल्पना ही उनके लिए मुश्किल थी. उनका एक ही बेटा था अंकित, जो अमेरिका में सेटल था. मां की मृत्यु पर वह आया था. महीना भर रहा भी. जाने से पहले उसने कहा था, “पापा, कुछ दिनों के लिए आप मेरे साथ चलिए.” किंतु उन्होंने इंकार करते हुए कहा, “नहीं अंकित, अभी मैं यहीं रहना चाहता हूं. इसी घर में. यहां की आबोहवा में तुम्हारी मां की सांसें बसी हुई हैं. उसकी यादों के सहारे बाकी की ज़िंदगी काट देना चाहता हूं.” किंतु अकेले रहना इतना सरल न था. खाने की द़िक्क़त की वजह से उनका स्वास्थ्य दिनोंदिन गिरता जा रहा था. आख़िरकार उन्हें बेटे के पास जाना ही पड़ा. शिकागो में दो माह कब बीत गए, उन्हें पता ही नहीं चला. अंकित और नेहा उनका ध्यान रखते थे. हर वीकेंड पर वे तीनों घूमने निकल जाते. वहां की ख़ूबसूरती और रहन-सहन का ढंग, तिस पर बच्चों का साथ, उन्हें लगा उनकी बाकी की ज़िंदगी आराम से कट जाएगी. एक दिन अंकित से उन्होंने इस संदर्भ में बात की, “तुम यूएस सिटिजन हो, मेरे ग्रीन कार्ड के लिए अप्लाई करोगे, तो जल्द ही मिल जाएगा. मैं चाहता हूं शेष जीवन तुम लोगों के साथ ही गुज़ार दूं.” यह सुनते ही नेहा की भावभंगिमा कठोर हो गई थी. उस दिन के बाद से ही उन दोनों का उनके प्रति व्यवहार बदल गया था. ज़ाहिर था, वे दोनों उन्हें अपने साथ रखना नहीं चाहते थे. उनके ठंडे और उपेक्षित व्यवहार को वे ज़्यादा दिन तक सहन नहीं कर पाए थे और तीन माह शिकागो रहकर वापस भारत लौट आए थे. चार वर्ष गुज़र गए. अंकित ने फिर कभी उन्हें अमेरिका नहीं बुलाया. अमेरिका से लौटकर उन्होंने अपनी देखभाल के लिए एक नौकर रख लिया, पर जल्द ही वह घर में चोरी करके भाग गया. तब उनके एक मित्र ने उन्हें किराएदार रखने की सलाह दी, जो भले ही किराया कम दे, पर उनके खाने, घर की साफ़-सफ़ाई आदि का ख़्याल रखे. इस संदर्भ में पेपर में पढ़कर ही रजत और प्रिया उनके पास आए थे. उनका तीन बेडरूम का फ्लैट था. अपने लिए एक बेडरूम और बालकनी छोड़कर शेष पूरा घर उन्होंने किराए पर उठा दिया था. शुरू-शुरू में वे अपने कमरे में ही रहते थे. बाहर निकलने में उन्हें संकोच होता. नए शादीशुदा जोड़े की प्राइवेसी में दख़ल न हो, यही विचार मन में लिए वह अपने कमरे में ही पड़े रहते. सुबह की चाय रजत कमरे में पहुंचा देता. उसके ऑफिस चले जाने पर नाश्ता, लंच आदि की ज़िम्मेदारी प्रिया की रहती. उस दिन संडे था. बेड टी पीने के बाद वे अपने कमरे में चुपचाप लेटे छत को निहार रहे थे. रजत कमरे में आकर बोला था, “अंकल, आप हमारे पिता के समान हैं. सारा दिन कमरे में अलग-थलग से क्यों पड़े रहते हैं? बाहर आकर हमारे साथ बैठकर बातें किया कीजिए. खाना भी हमारे साथ ही खाया कीजिए.” सुनकर उन्हें अच्छा लगा, पर प्रकट में बोले, “बेटे, मैं नहीं चाहता. तुम दोनों को परेशानी हो.” “इसमें परेशानी की क्या बात है अंकल, बल्कि हमें अच्छा लगेगा.” रजत उनका हाथ पकड़कर नाश्ते की टेबल तक ले आया था. उनकी पलकें भीग उठी थीं. कुछ पुरानी स्मृतियां दिलोदिमाग़ पर उभरने लगी थीं. जिस दिन उन्होंने अंकित से अपने ग्रीन कार्ड की बात की थी, उसी दिन से अंकित और नेहा अलग-थलग से रहने लगे थे. यहां तक कि खाना भी साथ बैठकर नहीं खाते थे. देवव्रत सारा दिन अकेले पड़े रहते. एक शाम अंकित और नेहा के ऑफिस से आने पर वे अपनी चाय लेकर उन दोनों के पास जा बैठे थे, ताकि दो घड़ी बच्चों से बात कर सकें. कुछ अपनी कहें, कुछ उनकी सुनें. लेकिन नेहा को उनका आना नागवार गुज़रा था. चिढ़कर वह अंकित से इस तरह बोली ताकि देवव्रत को सुनाई पड़ जाए. “अंकित, सारा दिन थके हम घर लौटे हैं. अब क्या हमें अपने घर में भी प्राइवेसी नहीं मिलेगी?” देवव्रत उल्टे पांव कमरे से बाहर चले गए थे. उस दिन उन्होंने सोचा, एकांतवास ही करना है, तो क्यों न भारत जाकर अपने घर में संध्या की यादों के साथ रहा जाए और वे लौट आए थे. किंतु अतीत का सुख भी वर्तमान के दुख का कारण बनता है. अकेलेपन से उपजी निराशा ने धीरे-धीरे उनके दिलोदिमाग़ को अपनी गिरफ़्त में ले लिया था. उनका घूमने जाना, दोस्तों से मिलना-जुलना सब छूट गया था. धीरे-धीरे जीने की इच्छा ही समाप्त हो गई थी. क्यों जीएं और किसके लिए? आख़िर उनका अपना है ही कौन? आज जब रजत और प्रिया ने आत्मीयता से अपने पास बैठाकर खाना खिलाया, तो उनकी आंखें भर आईं. न जाने कितने दिनों बाद अपनत्व का एहसास हुआ था. उस दिन के बाद से रजत और प्रिया अपनी हर समस्या उनके साथ शेयर करते और उनसे यथोचित सलाह लेते. उस दिन सुबह प्रिया ने कहा था, “अंकल, बेड टी पीकर आप मॉर्निंग वॉक पर जाया कीजिए, आपने देखा नहीं, चलते समय आपकी टांगें कांपने लगी हैं. यह घर में बैठे रहने का नतीजा है.” किसी आज्ञाकारी बच्चे की तरह उन्होंने प्रिया की बात मानकर घूमने जाना शुरू कर दिया था. एक दिन रजत और प्रिया ने उन पर ज़ोर डाला कि वह अपने सब दोस्तों को चाय पर बुलाएं. ख़ुशी से उनकी आंखों से आंसू बहने लगे थे. ऐसा लग रहा था, जैसे एक बार पुनः वह ज़िंदगी से जुड़ने लगे हों. न जाने कितने वर्षों बाद उस शाम वह खुलकर हंसे थे. रजत और प्रिया के साथ समय कैसे गुज़र गया, पता ही नहीं चला और अब पिछले चार माह से उनकी व्यस्तताएं बढ़ गई हैं. रजत ने उन्हें कंप्यूटर सिखा दिया है और वे उसके बिज़नेस का एकाउंट मेंटेन करने में उसकी मदद करने लगे हैं. अक्सर वह सोचते हैं, रजत और प्रिया के साथ अवश्य ही उनका कोई पिछले जन्म का नाता है, तभी तो दोनों उन्हें इतना स्नेह व मान-सम्मान देते हैं. आज अंकित का पत्र पढ़कर भले ही उनकी भावनाओं को ठेस पहुंची हो, पर एक बात उन्हें अवश्य समझ में आ गई है कि ख़ून के रिश्ते दिल के भी क़रीब हों, यह ज़रूरी नहीं है. अंकित को वे बता देना चाहते हैं कि उनके पास जो भी रुपया-पैसा व प्रॉपर्टी है, वे उन्हें अपने पिता से विरासत में नहीं मिली है, बल्कि उनकी दिन-रात की मेहनत से कमाई हुई है. इसलिए वे उसे जिसे चाहे दें, यह उनकी इच्छा पर निर्भर करता है. उन्होंने और संध्या ने सारी ज़िंदगी मेहनत की, पर स्वयं पर ख़र्च करने में सदैव कोताही बरती, ताकि वे अंकित को पढ़ने के लिए अमेरिका भेज सकें. अपने बुढ़ापे के लिए कुछ जोड़ सकें. लेकिन अब सभी चिंताओं से मुक्त वह बिंदास जीवन जीना चाहते हैं. स्वयं पर ख़र्च करना चाहते हैं. अंकित को लगता है, रजत और प्रिया जो भी कर रहे हैं, उसमें उनका स्वार्थ निहित है. हो सकता है, उसका यह संदेह निराधार न हो, पर आज का सच यही है कि जीवन की इस सांध्यबेला में रजत और प्रिया ने ही उनको न स़िर्फ सहारा दिया है, बल्कि उनकी ज़िंदादिली से जीने की ख़्वाहिश भी पूरी की है. आज अंकित का पत्र पढ़कर उनका यह निश्चय दृढ़ हुआ है कि वह रजत और प्रिया को उनकी सेवा का फल अवश्य देंगे. अपनी वसीयत में अपना यह मकान रजत और प्रिया के नाम करके वह दुनिया को यह संदेश देना चाहते हैं कि सेवा करनेवाले का हक़ सदैव बड़ा होता है. ज़िंदगी का क्या भरोसा, पता नहीं, कल का सूरज देखना नसीब हो या न हो, इसलिए वह उठे और अपनी इस इच्छा को मूर्त रूप देने के लिए अपने वकील के पास चल दिए. Rajni Kapoor

12/07/17

हाउसवाइफ़

Rajni Kapoor हाउसवाइफ़ . प्रज्ञा को रिसेप्शन हॉल में बिठाकर नितिन न जाने किधर गुम हो गए. प्रज्ञा उस डेकोरेटेड हॉल और उसमें विचरती रूपसियों को देखकर चमत्कृत-सी हो रही थी. कहां तो आज अरसे बाद वह थोड़े ढंग से तैयार हुई थी. नीली शिफ़ॉन साड़ी के साथ मैचिंग एक्सेसरीज़ में ख़ुद को दर्पण में देख शरमा-सी गई थी प्रज्ञा. शादी के बीस बरस बाद भी उसमें इतनी कशिश है. वैसे तो उसकी सादगी ही उसकी कमनीयता को बढ़ा देती है. चालीस की उम्र में तीस की नज़र आना वाकई कमाल की बात है. . . घर से निकलते समय टीनएजर बेटी ने प्यारा-सा कॉम्प्लीमेंट उछाल दिया था, “हाय मम्मी! आज तो पार्टी में आप छा जाएंगी.”. . लेकिन यहां तो समीकरण ही उलट गया था. उन आधुनिकाओं से अपनी सादगी की तुलना कर उस एयरकंडीशन्ड हॉल में भी उसके माथे पर पसीने की बूंदें चुहचुहा उठीं. पर्स से रुमाल निकाल कर अभी वह पसीना सुखा ही रही थी कि मेकअप में लिपी-पुती-सी एक मैडम मुस्कुराती हुई उसके सामने प्रकट हुई, “एक्सक्यूज़ मी, आप मिसेज़ नितिन खरे हैं ना?” प्रज्ञा कुछ बोल सकने की स्थिति में नहीं थी. किसी तरह उसने स्वीकारोक्ति में गर्दन हिला दी . “मैं रमोला भारती, केमिस्ट्री डिपार्टमेंट से हूं. सर ने कहा है कि आपको सबसे मिला दूं.” प्रज्ञा उसके साथ यंत्रवत् चलने लगी. “इनसे मिलिए, ये हैं मिसेज़ नितिन खरे!” रमोला ने इस अदा से प्रज्ञा को सभी के सामने मिलाया कि कई जोड़ी निगाहें उसका एक्स-रे करने लगीं. “वैसे आप करती क्या हैं?” खनकदार आवाज़ में उछाले गए प्रश्न के जवाब में प्रज्ञा ज़बरन मुस्कुराई, “मैं हाउसवाइफ़ हूं.” “हाउसवाइफ़! ओह तभी तो इतनी सिंपल हैं.” न चाहते हुए भी प्रज्ञा की नज़रें आवाज़ की दिशा में उठ गईं. एक भारी-भरकम शरीर की महिला, जिसने अपने शरीर को वेस्टर्न ड्रेस में जकड़ रखा था और मेकअप की परतों के बीच अपनी उम्र को छिपाने की नाकाम-सी कोशिश की हुई थी, कुछ अजीब अंदाज़ में मुस्कुरा रही थी. . पता नहीं प्रज्ञा की नज़रों में क्या था कि रमोला सकपका गई, “आप हैं मिसेज़ साक्षी सान्याल, इन्फोसिस में चीफ़ एक्ज़ीक्यूटिव हैं. मिस्टर सान्याल यहां फ़िज़िक्स के हेड ऑफ़ दि डिपार्टमेंट हैं.” फिर बारी-बारी से रमोला ने सबका परिचय कराया. उनमें से आधी से ज़्यादा तो यूनिवर्सिटी की लेक्चरार थीं और बाकी प्रो़फेसर्स की पत्नियां, जो कहीं न कहीं जॉब करती थीं. तभी तो प्रज्ञा का हाउसवाइफ़ होना उन्हें हैरत में डाले हुए था. प्रज्ञा का जी चाह रहा था कि वह चुपचाप उठकर वापस घर चली जाए, लेकिन यह भला कैसे संभव था? पार्टी तो उसी के पति मिस्टर नितिन खरे के सम्मान में हो रही थी. वेटर कोल्ड ड्रिंक लेकर आया तो उसने बेमन से ले लिया. नितिन के लिखे ‘हिन्दी साहित्य का इतिहास’ को आज कुलपति के हाथों ‘अकादमी पुरस्कार’ मिलने वाला था और उन्हें ‘रीडर’ की उपाधि से भी नवाज़ा जा रहा था. नितिन के लेक्चरार से रीडर बनने तक के सफ़र में प्रज्ञा ने हर पल उनका साथ दिया था. अब वह इन तितलियों को अपने जॉब न करने की क्या सफ़ाई दे? . एक तो नितिन का स्वभाव ऐसा है कि वे जब तक घर में रहें, प्रज्ञा उनके आसपास होनी चाहिए. दूसरी बात, जो ख़ुद प्रज्ञा को गंवारा नहीं थी, वह यह कि उसके बच्चे आया के भरोसे पलें. उन्हें स्कूल से आकर मां के बदले बंद ताले को देखना पड़े. ख़ैर जो भी हो, लेकिन आज प्रज्ञा कुंठित हो गई थी. हाउसवाइफ़ होना वाकई हीनता का परिचायक है. हाउसवाइफ़ का अपना कोई वजूद नहीं होता. वैसे कभी-कभार प्रज्ञा के मन में अपने हाउसवाइफ़ होने को लेकर हीन ग्रंथि पलने लगती थी, लेकिन उसने आज जैसा अपमान कभी महसूस नहीं किया था. अभी प्रज्ञा न जाने और कितनी देर तक ख़ुद से सवाल करती, अगर रमोला ने टोका न होता, “अरे मैम, आप खाली बोतल लेकर बैठी हैं, दूसरी लाकर दूं?” वाकई उसकी कोल्ड ड्रिंक तो कब की समाप्त हो गई थी. वो ज़बरन मुस्कुराते हुए ‘नो थैंक्स’ कह, उठकर खाली बोतल डस्टबिन के हवाले कर आई. प्रज्ञा की कुंठा उस पर हावी होती जा रही थी. वह सचमुच उठकर जाने की सोच ही रही थी कि स्टेज पर माइक थामे नितिन को देखकर अपनी कुर्सी से चिपक कर रह गई. तालियों की गड़गड़ाहट के बीच नितिन की गंभीर आवाज़ गूंज उठी, . “वैसे तो यह एक घिसा-पिटा डायलॉग है कि हर सफल पुरुष के पीछे एक औरत का योगदान होता है, लेकिन मेरे मामले में यह सौ फ़ीसदी सच है. आज मैं अपनी पत्नी प्रज्ञा की बदौलत ही इस मुक़ाम पर पहुंच सका हूं. मेरी ज़िंदगी में सबसे अहम् बात मेरी पत्नी प्रज्ञा का हाउसवाइफ़ होना है. डबल एम. ए. और गोल्ड मेडलिस्ट होते हुए भी मेरी इच्छा की ख़ातिर प्रज्ञा हाउसवाइफ़ बन कर हर क़दम पर मेरे साथ चलती रही.” प्रज्ञा जैसे नींद से जागी. उसकी कुंठा परत दर परत पिघलने लगी और नितिन का भाषण जारी रहा, “तन-मन से पूरी तरह समर्पित प्रज्ञा ने मुझे घर-बाहर की तमाम ज़िम्मेदारियों से मुक्त नहीं रखा होता, तो मैं इतना बड़ा ग्रंथ नहीं लिख पाता. आज के दौर में औरतों का जॉब करना उनका स्टेटस सिंबल बनता जा रहा है. लेकिन मुझे लगता है कि अगर प्रज्ञा भी कहीं जॉब करके ख़ुद की पहचान तलाश कर रही होती तो शायद मैं आज भी एक साधारण-सा लेक्चरार बना रहता.” . तालियों की गड़गड़ाहट के साथ ही प्रज्ञा की कुंठा पूरी तरह बह गई. उसका एक्स-रे करने वाली निगाहें अब झुकने लगीं. शायद वे रंगे हाथों पकड़ी गई थीं. पति के बराबर, बल्कि ़ज़्यादा कमाने के रौब में वे पति और बच्चों को कितना तवज्जो देती हैं? क्या उनके पति कभी नितिन की तरह सरेआम उनकी प्रशंसा कर सकते हैं? शायद कभी नहीं. नितिन ने प्रज्ञा को कितना ऊंचा उठा दिया था, यह मेहमानों की नज़रों में प्रज्ञा के प्रति उभर आए सम्मान से साफ़ पता चल रहा था. “मैं तो यही जानता हूं कि यह ग्रंथ मैं प्रज्ञा की बदौलत ही पूरा कर सका हूं. इसलिए इस पुरस्कार की असली हक़दार मेरी पत्नी प्रज्ञा है. आय एम प्राउड ऑफ़ माई लवली वाइफ़.” तालियों की गूंज के बीच प्रज्ञा स्टेज पर पहुंची. कुलपति महोदय ने नितिन को मेडल पहनाया तो नितिन ने उसे प्रज्ञा के गले में डाल दिया. प्रज्ञा का चेहरा अलौकिक तेज़ से चमक उठा. अपने पति के एक वाक्य ‘आय एम प्राउड ऑफ़ माई वाइ़फ ’ ने एक हाउसवाइफ़ को अपने हाउसवाइफ़ होने के गर्व से अभिभूत कर दिया. Rajni Kapoor